राजे को साधने भाजपा तलाश रही कर्नाटक फॉर्मूला: राजस्थान में चुनाव से पहले की रणनीति में वसुंधरा राजे अहम, उनके लिए BJP के पास 3 विकल्प


नई दिल्ली3 घंटे पहले

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वसुंधरा 2003 से 2008 तक राजस्थान की मुख्यमंत्री रही थीं।

भाजपा राजस्थान में 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को साधने का तरीका खोज रही है। पार्टी का मानना है कि राज्य में पार्टी की एकजुटता को लेकर कार्यकर्ताओं में संशय और लोगों के बीच सवाल नहीं उठे। फिलहाल, पार्टी वसुंधरा को लेकर जिस कर्नाटक फॉर्मूले पर मंथन कर रही है। यदि वह सफल होता है तो राज्य में नेतृत्व के यक्ष प्रश्न का समाधान निकल जाएगा।

कर्नाटक मॉडल से आश्वस्त थी वसुंधरा
पिछले हफ्ते वसुंधरा की नई दिल्ली में संगठन महामंत्री बीएल संतोष, राज्य के प्रभारी महासचिव अरुण सिंह और अन्य नेताओं से बैठक हुई। सूत्रों के अनुसार, बैठक में कर्नाटक मॉडल पर विस्तार से चर्चा हुई। वसुंधरा आश्वस्त नजर आईं। एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि राजे, प्रदेश-केंद्र का कोई भी नेता हो सबका लक्ष्य विधानसभा चुनाव में बड़े अंतर से जीत हासिल करना है। इसके लिए चुनाव सामूहिक नेतृत्व में लड़ा जाए या नेता घोषित कर लड़ा जाए इसको लेकर अलग-अलग राय हो सकती है।

राजे को लेकर भाजपा अपना सकती है ये विकल्प

  • पार्टी वसुंधरा को प्रदेश अध्यक्ष बना कर चुनाव लड़े।
  • उन्हें येदियुरप्पा की तरह पूर्व निर्धारित शर्तों के साथ सीएम प्रोजेक्ट कर दे।
  • कैंपेन कमेटी का मुखिया बना कर पार्टी सामूहिक नेतृत्व में लड़े।

अरुण सिंह- सामूहिक चुनाव लड़ती है भाजपा
दूसरा सवाल है मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष के नेतृत्व में ही चुनाव हो या नया अध्यक्ष हो इसको लेकर भी अलग-अलग राय हो सकती हैं। पार्टी के एक नेता कहते हैं कि राजस्थान में इस तरह के सवाल पहले भी आते रहे हैं। नेता कौन होगा? प्रदेश अध्यक्ष कौन होगा? लेकिन यह सब मुद्दे उचित समय पर हल हो गए हैं। इस बार भी यही होगा।
भाजपा महासचिव अरुण सिंह ने कहा कि राजे बड़ी नेता हैं। भाजपा हमेशा सामूहिक रूप से ही चुनाव लड़ती है और इस बार भी ऐसा ही होगा।

क्या है कर्नाटक फॉर्मूला
कर्नाटक में 2018 के चुनाव में येदियुरप्पा को अध्यक्ष बनाया गया। इसको लेकर पार्टी में राय अलग थी।फिर उन्हें मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनाया गया। पार्टी ने जीत हासिल की। लेकिन शपथ लेने के बाद बहुमत से कम होने की वजह से उन्हें हटना पड़ा। बाद में येदियुरप्पा जेडीएस-कांग्रेस की सरकार गिराकर सीएम बने।आला कमान ने उन्हें इस बात के लिए बाद में राजी कर लिया कि, वह पद छोड़ दें और अन्य को मौका दें। येदियुरप्पा ने ऐसा ही किया। पद छोड़ने के बाद पार्टी ने उनका सम्मान रखा और उन्हें पार्टी के संसदीय बोर्ड में जगह दी।

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